बुधवार, १४ फेब्रुवारी, २०२४

गझल

  


ये शहर मुझे रास न आया

यूँ जिने का अहसास न आया


क्या पाया क्या खोया मैने

कोई भी तो पास न आया


सबकुछ था फिर भी मुझ को 

रहनसहन का मिजास न आया


बुत बनकर यूँ बैठे हैं कि

दिल में उम्मीद-ओ-यास न आया


हाल बयाँ करने का जुनूँ था

लफ्जों में कुछ खास न आया


     - प्रमोद माने 

        १४|०२|२०२४


 बुत= पुतळा

उम्मीद-ओ-यास = आशा आणि निराशा

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